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स्त्रियों के लिये कितनी समावेशी है विज्ञान की दुनिया?

How inclusive is the world of science for women?

स्त्रियों के लिये कितनी समावेशी है विज्ञान की दुनिया?

How inclusive is the world of science for women?

स्त्रियों के लिये कितनी समावेशी है विज्ञान की दुनिया?
स्त्रियों के लिये कितनी समावेशी है विज्ञान की दुनिया?

 

राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार) ने एक पुस्तिका प्रकाशित की है। इसका नाम है– विदुषी’:  इंडियन वूमेन इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी ।

इस पुस्तिका में प्राचीन से लेकर समकालीन भारत तक महिला वैज्ञानिकों और मनीषियों की चर्चा मिलती है। कई नाम तो इतने प्रसिद्ध हैं कि वह सबकी उंगलियों पर रहते हैं। प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ भास्कराचार्य की पुत्री लीलावती को तो आप जानते ही होंगे? हाँ, वही लीलावती जिनका विवाह जब किन्हीं कारणों से नहीं हो पाया था तो वह बड़ी व्यथित थीं और उनका मन रखने के लिए भास्कराचार्य ने लीलावती नाम का ग्रंथ लिख डाला था। गाथा है कि लीलावती स्वयं एक विलक्षण गणितज्ञ और ज्योतिष थी लेकिन एक ओर जहाँ भास्कराचार्य के लिखित ग्रंथ मिलते हैं वहीं लीलावती की लेखनी का क्या हुआ यह हम नहीं जानते।

ठीक उसी तरह और कुछ नाम जैसे, कादम्बनी गांगुली जो अंग्रेजी साम्राज्य के भीतर साल 1886 में एलोपैथी औषधि परंपरा में पहली महिला डॉक्टर बनीं, आनंदी गोपाल जोशी भी 1886 में अमेरिका में पढ़ते हुए डॉक्टर हुईं, अन्ना मणि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की निदेशक हुईं, राजेश्वरी चटर्जी जो माइक्रोवेव और एंटीना अभियांत्रिकी की बड़ी नाम रहीं, या भारत में गैमेट इंट्रा फैलोपियन ट्रांसफर (जी आई एफ टी) की प्रणेता और पहले टेस्ट्यूब शिशु के जन्म को संभव बनाने वाली डॉ. इंदिरा हिंदुजा के बारे में हम सोच सकते हैं। थोड़ा और ‘पॉपुलर’ नाम तलाशें तो किरण मजूमदार शॉ या कल्पना चावला, या फिर भारत में जीन कैंपेन की संस्थापक सुमन सहाय या चंद्रयान II से जुडी वैज्ञानिकों एम वनीता और ऋतु कारिधाल का नाम ले सकते हैं।

सवाल यह रह जाता है कि भारतीय सभ्यता संदर्भ में बार-बार विज्ञान और ज्ञान परंपरा की समृद्धि पर बात करते हुए कितने नामों की गिनती एक महान महिला वैज्ञानिक परंपरा की सूचक होगी? क्या ऊपर जो कई विधाओं से कुछ नाम गिनाए गए हैं उन्हें इस ब्लॉग का पाठक ठीक से पहचानता है?

हम भारत की आजादी के 75वें वर्ष का उत्सव यानी आजादी का अमृत महोत्सव देश के हर हिस्से में मना रहे हैं। इसी दिशा में आगे जाते हुए 22 – 28 फरवरी 2022 के दौरान भारत सरकार ने ‘विज्ञान सर्वत्र पूज्यते’ नाम से देश में 75 जगहों के साथ नई दिल्ली में मेगा विज्ञान उत्सव को मनाया। यह स्लोगन कुछ वैसा ही सुनाई देता है जैसे ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ को हम सुनते रहते हैं। तो आइए इस यत्र और सर्वत्र की जाँच कुछ आंकड़ों के आधार पर ही कर लें, आखिर वैज्ञानिक दृष्टि उसी से तो बनेगी।

विज्ञान में महिलाओं की स्थिति

इस लेख के पाठकों को ध्यान में रखते हुए हम नीति आयोग जैसी संस्था के हवाले से ही चर्चा आगे बढ़ाते हैं। साल 2017-18 में नीति आयोग ने ‘स्टेटस ऑफ वूमेन इन साइंस अमंग सिलेक्ट इंस्टीट्यूशंस इन इंडिया: पॉलिसी इंप्लिकेशंस’ नाम का रिपोर्ट प्रस्तुत किया जिसे आप इंटरनेट पर आसानी से पढ़ सकते हैं। इसमें एक अध्याय ड्रॉप आउट करने वाली महिला वैज्ञानिकों पर आधारित था। वहाँ से दो उदाहरण देखते हैं।

एक महिला वैज्ञानिक को पोस्ट-डॉक्टोरल कार्य का अनुभव था। वह आण्विक जीवविज्ञान में पीएच.डी थी और उसके पास स्थायी नौकरी नहीं थी। जीवन के चालीसवें साल में और एकल (कभी विवाहित नहीं), वह पिछले कार्य अनुभव में दो साल के लिए SERB वित्त पोषित युवा वैज्ञानिक परियोजना में एक प्रधान अन्वेषक के रूप में काम कर चुकी थीं और दो और अस्थायी परियोजनाओं में शामिल रही थीं। उन्होंने 2004 में अपनी पहली नौकरी के बाद से बार-बार नौकरी में किए गए बदलाव और करियर में रुकावट के लिए वित्त पोषित परियोजनाओं की कमी का हवाला दिया। वहीं एक दूसरी वैज्ञानिक हैं जिन्हें पोस्ट-डॉक्टोरल कार्य अनुभव है और उनकी पीएच.डी परमाणु भौतिकी में थी। वह वर्तमान में करियर ब्रेक से गुजर रही हैं। अपने चालीसवें वर्ष में और विवाहित वह दो सम्मानित फैलोशिप– सीएनआरएस और डीएई की पुरस्कार विजेता हैं। उनके पिछले कार्य अनुभव में तीन साल के लिए सीएसआईआर साइंटिस्ट्स पूल स्कीम के तहत एक वरिष्ठ अनुसंधान सहयोगी के रूप में काम करना शामिल है। लेकिन वह पिछले 10 वर्षों से अपने बढ़िया कैरियर के बिखराव और बेरोजगारी के लिए पारिवारिक देखभाल का हवाला देती हैं।

यह दो उदाहरण जानबूझ कर एक संकेत की तरह सामने रखे गए हैं। प्रोजेक्ट में फाइनेंस की कमी या परिवार के देखभाल के लिए अपने उन्नत करियर को छोड़कर उससे अलग हो जाने की बातें पुरुष वैज्ञानिकों के मामले में बहुत कम मिलेंगी। फिर विज्ञान की एकल धारा को बाँटने वाली इस जेंडर आधारित “सेक्सिज्म” पर सरकारी रिपोर्ट या उनके प्रश्नवालियाँ चुप्पी क्यों साध जाती हैं?

इतिहास से कुछ उदाहरण

लीलावती की विडंबना एक उदाहरण तक सीमित नहीं। वह विज्ञान के इतिहास और वर्तमान की नियति है। क्या आप रोसालिंड फ्रैंकलिन या बारबरा मैक्लिंकटॉक के नाम से परिचित हैं? फ्रैंकलिन एक अंग्रेजी रसायनज्ञ और एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफर थीं जिनका काम डीएनए (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) और आरएनए (राइबोन्यूक्लिक एसिड) की आणविक संरचनाओं की समझ के लिए केंद्रीय था। अगर डीएनए के डबल हेलिक्स ढाँचे की खोज 20वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजों में से एक थी तो उसके पीछे एक महिला फ्रैंकलिन खड़ी थी। जब इस खोज के लिए नोबेल प्राइज दिया गया तब फ्रैंकलिन का देहांत हो चुका था और उनके नाम की चर्चा तक नहीं हुई थी। कहीं बाद में इस खोज के लिए तीन नोबेल विजेताओं में से एक जेम्स वाटसन ने इस बात को स्वीकार किया लेकिन इसे ऐसे कहा गया कि स्वीडिश नोबेल समिति मरणोपरांत पुरस्कार नहीं देती।

वैसे ही, मैक्लिंकटॉक जो खुद बाद में नोबेल पुरस्कार विजेता बनीं, उन्होंने ‘जंपिंग जीन्स’ की खोज की। उनके द्वारा किए गए दशकों के आनुवंशिक मानचित्रण डेटा ने दिखाया था कि जीन एक दूसरे के सापेक्ष निश्चित स्थिति में रैखिक रूप से व्यवस्थित रहते हैं जिसे शोधकर्ताओं के लिए स्वीकार करना कठिन हो गया। लगभग पूरा वैज्ञानिक समुदाय यह नहीं मान रहा था कि जीन जीनोम के भीतर स्थानांतरित हो सकते हैं। मैक्लिंटॉक ने वैज्ञानिक समुदाय की प्रतिक्रिया से खुद को हतोत्साहित नहीं होने दिया।

विज्ञान के इतिहास में ऐसे कई ‘सेक्सिज्म’ की मिसालें मिल जाएंगी। बातों को बेहद तकनीकी न बनाते हुए हमें यह समझना होगा कि पुरुषों के वर्चस्व वाली विज्ञान की दुनिया में एक महिला को अपने जेंडर के नाते किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। पाठक हाल में आई अमेरिकी वैज्ञानिक रीटा कॉलवेल की पुस्तक ‘अ लैब ऑफ वन्स ओन: वन वूमेंस पर्सनल जर्नी थ्रू सेक्सिज्म इन साइंस’ (2020) पढ़ सकते हैं।

ध्यान दें कि यह किताब एक वैश्विक महामारी के समय लिखी गई है। तब जब अमेरिका में कोरोनावायरस के खिलाफ जंग में कई महत्वपूर्ण लोगों में महिला वैज्ञानिक प्रमुखता से शामिल रहीं। उदाहरण के लिए, यूसी सैन डिएगो की किम्बर्ली प्राथर वायरस को फैलाने में हवाई संचरण की भूमिका को स्थापित करने में अग्रणी रहीं हैं। प्रसिद्ध यूसी बर्कले शोधकर्ता जेनिफर डौडना, जो जीन-एडिटिंग तकनीक में अग्रणी हैं, ने परीक्षण में सुधार करने और कोविड टीके की खोज में तेजी लाने के प्रयासों में खुद को झोंक दिया था। महामारी विज्ञानियों, डॉक्टरों, नर्सों और लैब तकनीशियनों सहित अनगिनत अन्य महिलाओं ने खुद को कोविड-19 को कुचलने के लिए समर्पित कर दिया। ऐसे में भी हमने कई मामले देखे जहाँ महामारी के आरंभ में कई महिलाओं को उनके रिहायशी में घुसने से रोकने के प्रयास हुए थे।

यह कई तरह के बेमेल उदाहरण देने का बस एक कारण है कि विज्ञान का महिला प्रश्न सरकारी और राजकीय प्रयासों से कहीं दूर एक बेहद उलझा हुआ मामला है। इसे समझने के लिए अनेक महिला वैज्ञानिकों और विज्ञान को अपना अध्ययन और पेशा बनाने वाली महिला और लड़कियों की आपबीती सुनने की जरूरत है। इसे हम इतिहास से जान सकते हैं। वर्तमान के अनुभव से सीख सकते हैं। तब कहींभविष्य में एक ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ बन पाएगा।

 

– शाश्वती प्रधान

(लेखिका ने बीएचयू से जीव विज्ञान की पढाई की है और ‘साइंस एस्केप’ नामक साइंस मासिक पत्रिका की संपादक हैं)

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