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स्वामी विवेकानंद और राष्ट्र का वैज्ञानिक कायाकल्प

स्वामी विवेकानंद और राष्ट्र का वैज्ञानिक कायाकल्प

स्वामी विवेकानंद और राष्ट्र का वैज्ञानिक कायाकल्प

 

स्वामी विवेकानंद और राष्ट्र का वैज्ञानिक कायाकल्प
स्वामी विवेकानंद और राष्ट्र का वैज्ञानिक कायाकल्प

विज्ञान और अध्यात्म के मध्य कैसा संबंध है? अधिकांश संशयवादी और भौतिकवादी वैज्ञानिक आध्यात्मिक ज्ञान और धार्मिक शास्त्रों को न केवल गैर-विज्ञान मानते हैं, बल्कि उसे अनिवार्य रूप से मिथ्या, अन्धविश्वास और अवैज्ञानिक सोच के कारक की तरह देखते हैं। इस तरह के “विरोधी” दृष्टिकोण के एक विशिष्ट प्रस्तावक के रूप में हम जीव विज्ञानी और पॉपुलर साइंस लेखक रिचर्ड डॉकिन्स की तरफ देख सकते हैं। डॉकिन्स अपनी पुस्तक द गॉड डिल्यूजन (2006) में धर्म को एक भ्रम की तरह समझते हैं जो “जड़ मिथ्याचार” पर आधारित होता है। इस उग्र संशयवाद और धर्म के प्रति कठोर आलोचना में डॉकिन्स जैसे वैज्ञानिकों की कोई स्वार्थ प्रेरणा नहीं है। अगर वह धर्म की ढील छोड़ते हैं तो विकासवाद (Evolutionism) पर सृष्टिवाद (Creationism) हावी हो जाएगा, धरती को सपाट बताने वाले वैसे ही तर्क करते रहेंगे, और ब्रह्मांड की संरचना और उद्भव को बाइबिल, कुरान, और वेदों में ढूंढा जाता रहेगा।

फिर प्रश्न यह रह जाता है कि स्वामी विवेकानंद (1863-1902) जैसे चिंतकों का अध्ययन कैसे करें जिन्होंने विज्ञान पर कई विचार रखें हैं, लेकिन वो अध्यात्म की रूपरेखा से संवाद करते हैं? विमर्श में विज्ञान और अध्यात्म के इन अतिरेकों में अमेरिकी जीव वैज्ञानिक स्टीफेन जे गोउल्ड ने एक मध्यम मार्ग सुझाया है। अपनी पुस्तक रॉक्स ऑफ एजेस: साइंस एंड रिलिजन इन द फुलनेस ऑफ लाइफ (1999) में गोउल्ड ने ‘नॉन ओवरलैपिंग मजिस्टेरिया’ (NOMA) की बात की है। इसे हिंदी में ‘गैर-परस्परव्याप्त महिमा’ कह सकते हैं। आशय है विज्ञान और धर्म दो ऐसे माहात्म्य हैं जो कभी परस्पर नहीं होते लेकिन दोनों स्वतंत्र रहते हुए भिन्न प्रभाव क्षेत्र और अन्वेषण का अधिकार देते हैं। विज्ञान तथ्य का अधिकार देता है, धर्म मूल्य का। तो स्वामी विवेकानंद जैसे संन्यासी विचारकों की उक्ति को तथ्य या “हार्ड एविडेंस” की परीक्षा से गुजरने की जरूरत नहीं। उन्हें मूल्य की तरह समझना उचित है, और इन्हीं मूल्यों में वैज्ञानिक कायाकल्प की सुगबुगाहट भी है।

विवेकानंद के विचारों में धर्म और विज्ञान दोनों दर्शन से निकलते है। विज्ञान की उपयोगिता पृथ्वी पर जीवन की बेहतरी के लिए प्रकृति की शक्तियों का उपयोग करने और ज्ञान के रास्ते ब्रह्मांड की वास्तविकता से परिचित होने में है। उनका मत था कि विज्ञान धर्म का दूत है। धर्म जहाँ सत्य की खोज के लिए मेंढक कूद का मार्ग अपनाता है, वहीं विज्ञान अन्वेषण तकनिकी की औपचारिकता से सत्य तक क्रमशः पहुँचता है। इसी क्रम में अंतर्ज्ञान (Intuition) की चर्चा की जा सकती है। विवेकानंद की मान्यता थी कि अंतर्ज्ञान ज्ञान का एक वैध रूप है। औपनवेशिक भारत में अनेक भारतीय वैज्ञानिकों ने अतीत का अध्ययन करने का गंभीर प्रयास किया। वास्तव में, इतिहासकारों ने दिखाया है कि कैसे औपनिवेशिक मुठभेड़ ने भारतीय बुद्धिजीवियों के बीच ‘पुनरुद्धार’ की एक परियोजना को प्रेरित किया। यह कायाकल्प इस विचार की एक खोज के लिए था कि भारतीय परंपराएँ तर्कसंगतता, निष्पक्षता और आधुनिक विज्ञान की अन्य विशेषताओं से रहित नहीं थी। कई भारतीय वैज्ञानिक औपनिवेशिक आधुनिकता में प्रशिक्षित हुए, कई इस आधुनिकता का विकल्प खोजते रहें, और कइयों ने इसे बदलने का प्रयास भी किया। महेन्द्रलाल सरकार द्वारा स्थापित इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस (1876) एक ऐसा ही प्रयास था। इसी क्रम में बंगाल में दार्शनिक ब्रजेन्द्रनाथ सील ने द पॉजिटिव साइंसेज ऑफ द एन्सिएंट हिन्दू (1915) नाम की किताब लिखी। सील ने आग्रह किया कि “पुरातनता ऋषियों के पास पदार्थ के परमाणु सिद्धांत के अनुकूल विचार थे, लेकिन यह एक ‘सुखद अंतर्ज्ञान’ था जो गहन ध्यान और बुद्धिमान अवलोकन के कारण हो सकता है।” स्पष्ट है कि सील यह कह रहे थे कि कणाद जैसे ऋषियों के विचार को हम जॉन डाल्टन के सिद्धांत की तरह नहीं समझ सकते। लेकिन फिर भी दोनों में अंतर्ज्ञान की भूमिका केंद्रीय है। आधुनिक विज्ञान केवल प्रयोग, प्रमाण और प्रमेय पर आश्रित न होकर अंतर्ज्ञान पर भी आश्रित है। इस ओर नोबेल पुरस्कार सम्मानित जीव विज्ञानी पीटर मेड़वार (1915-1987) की किताब इंडक्शन एंड इंट्यूशन इन साइंटिफिक थॉट (1969) पढ़ी जा सकती है।

विवेकानंद के समकालीन हस्तक्षेप

क्या आप यह जानते हैं कि भारत की सबसे प्रतिष्ठित विज्ञान संस्था — इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंसेज, बेंगलूरू (आई आई एस सी) की स्थापना के पीछे विवेकानंद की प्रेरणा थी? 1893 की गर्मियों में दो भारतीय, जो अपने व्यवसाय में बहुत भिन्न थे, जापान के योकोहामा से कनाडा के वैंकूवर तक पानी के जहाज पर एक साथ यात्रा कर रहे थे। एक 30 वर्षीय संन्यासी था और दूसरा एक उद्योगपति। दोनों में भारतीय समाज के कायाकल्प की चर्चा हुई। पांच वर्षों बाद नवंबर 23, 1898 को जमशेदजी टाटा ने स्वामी विवेकानंद को पत्र लिखकर यह स्मरण करवाया कि उस जहाज यात्रा की उनकी चर्चा अब सार्थक होगी क्योंकि टाटा ने भारतीय विद्यार्थियों के लिए एक विज्ञान शोध संस्था बनाने का निश्चय किया है। टाटा ने उस दौर में 2 लाख स्टर्लिंग पाउंड की राशि इस कार्य के लिए समर्पित की थी। यहीं से आई आई एस सी के निर्माण की बुनियाद पड़ती है।

ठीक इसी तरह विवेकानंद की शिष्या भगनी निवेदिता और स्वयं विवेकानंद ने अग्रणी भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस का कई बार समर्थन किया था। उन्होंने न केवल उनके मुख्य प्रेरक के रूप में काम किया, बल्कि वर्षों तक उनके सभी कार्यों के लिए वित्तीय सहायता भी आयोजित की। 1899 में पेरिस में बोस ने अपने प्रयोगों के निष्कर्षों से अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय में काफी काफी गहरी छाप छोड़ी थी। तब विवेकानंद और निवेदिता दोनों बोस के साथ पेरिस में मौजूद थे। विवेकानंद और निकोलस टेस्ला के मध्य का जुड़ाव भी एक अद्भुत घटना है। 1895 में विवेकानंद ने अपने एक मित्र को पत्र में लिखा, “श्री टेस्ला सोचते हैं कि वह गणितीय रूप से प्रदर्शित कर सकते हैं कि बल और पदार्थ संभावित ऊर्जा में अनूदित हो सकते हैं। मुझे यह नया गणितीय प्रदर्शन देखने के लिए अगले सप्ताह उनसे मिलने जाना है। उस स्थिति में वेदांतिक विज्ञान एक निश्चित नींव पर रखा जाएगा।।। मुझे आधुनिक विज्ञान के साथ उनका पूर्ण जुड़ाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, और वह एक दूसरे का स्पष्टीकरण कर पाएंगे।” (कम्पलीट वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद, खंड 5, पृष्ठ 77) यहाँ विवेकानंद ने प्राण और आकाश के लिए ‘फाॅर्स’ और ‘मैटर’ का प्रयोग किया है। टेस्ला का संस्कृत और वेदांत में रुचि लेना और विवेकानंद का आधुनिक विज्ञान में रुचि लेना और प्रमाण की संस्कृति में विश्वास रखना विज्ञान और अध्यात्म के अतिरेकों में “मध्य मार्ग” का उदाहरण है।

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प्रफुल्ल चंद्र रे (1861-1944) ने भारत में वैज्ञानिक चेतना के पतन का सामाजिक कारण बताया है। उन्होंने इसके लिए जाति प्रथा को दोषी ठहराते हुए यह तर्क किया कि जाति प्रथा ने भारत में बौद्धिकी को शारीरिक श्रम से अलग कर दिया, और फलतः सिद्धांत को व्यवहार से। यानी जाति प्रथा के कारण विचार करने वाले मस्तिष्क का काम करने वाले हाथ से मेल नहीं हो पाया। लगभग यही बात विवेकानंद के यहाँ भी मिलती है। तो इस बात पर ध्यान देना होगा कि भारत में जगदीश चंद्र बोस जैसे वैज्ञानिकों ने अपने यंत्रों का नाम संस्कृत में रखा था, अपनी संस्था को एक ‘मंदिर’ कहा है, और उपनिषदों से भी उद्धरण दिया है। लेकिन यह विज्ञान की उस धारा को ‘पोंगापंथी’ नहीं बनाता। बोस ने अपनी आत्मकथा में यह आगाह किया था कि धार्मिक कट्टरवाद और अतीत में अतार्किक विश्वास भारत की प्रगति को बाधित कर देगा।

आज हम एक ऐसे राजनीतिक दौर में जी रहे हैं जहाँ पुष्पक विमान से लेकर प्राचीन भारत में टेलीविज़न, इंटरनेट, और स्टेम सेल थेरेपी की बात लोक विवाद में प्रकट होती रहती है। वैज्ञानिक चेतना धर्म प्रधानता से उपजे इस चिंतन को केवल मिथ्या करार देगा। धर्म विज्ञान को उसका विरोधी बताएगा। स्वामी विवेकानंद जैसे चिंतक के पास दोनों अतिरेकों में एक समाधान ढूंढने की गुंजाईश है। विवेकानंद ने जगदीश चंद्र बोस, निकोलस टेस्ला, या जमशेदजी टाटा को कभी यह नहीं कहा कि आधुनिक विज्ञान की क्या जरूरत है क्योंकि प्राचीन भारत में यह सभी खोज कर लिए गए हैं। हमें विवेकानंद से यह प्रेरणा मिलती है कि अध्यात्म और महातम की संस्कृति वाला देश आधुनिक विज्ञान से कैसे संवाद कर सकता है।

शान कश्यप

(लेखक रेवेंशा यूनिवर्सिटी, कटक में जलवायु परिवर्तन के इतिहास पर शोध कर रहा है)

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